हम अपनी सारी बातें कह देना चाहते है. पर कितनी सारी ऐसी बातें होती हैं जिन्हे कहा ही नहीं जा सकता, जो या तो शब्दों से परे होती हैं या फिर उन्हे सीधे सीधे कहना कुछ ग़लत सा लगता है.
मुझे ऐसी बातें बहुत पसंद हैं जिन्हे कहा नहीं जा सकता, जब कोई कहानी पढ़ कर या फिल्म देख कर मुझे ऐसा लगता है की इसमे तो असल में वो बात कही जा रही है जो कही ही नहीं जा सकती तो मुझे मज़ा आ जाता है.
पर सवाल ये है कि जब बात ऐसी है कि उसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता तो कहने की ज़रूरत क्या है. इतनी मेहनत क्यों की जाती है उन बातों को कहने की. ऐसी क्या ज़रूरत है हमारी की हम बस सारी बातें कह देना चाहते हैं.
दरअसल जो बात कही नहीं जा सकती है वो ही दिमाग़ में सबसे ज़्यादा शोर मचा रही होती है- दिमाग़ में मच रहे उस शोर को अगर पकड़ कर किसी चीज़ में बंद कर दिया जाए तो लगता है – वाह क्या शांति है! बंद करने के बहुत सारे तरीके मैने ढूँढ रखे हैं अपने लिए और कुछ और ढूँढ रही हूँ, लिखना शायद उनमे से एक है. कमाल की बात है की लिखने में भी शब्दों का ही प्रयोग हो रहा है और बात कह देने में भी शब्दों का ही प्रयोग है पर फिर भी लिखना ऐसा लगता है कि बात किसी से कही नहीं मैने सिवाय अपने- चाहे फिर उस लिखे हुए को हज़ार लोग पढ़ें. शायद इसलिए की मैं लिखने में अपने मन में हो रहे उस बात के शोर को पकड़ने की कोशिश मात्र कर रही होती हूँ जिसे कहा नहीं जा सकता. कभी लगता है की इस बात का जिसे कहा नहीं जा सकता अगर मैं किसी तरह एक चित्र बना दूँ तो शायद शोर और थोड़ा कम होगा.
हर किसी के पास इन बातों को जिन्हे कहा नहीं जा सकता कहने के ऐसे बहुत सारे तरीके होते हैं. वो सारे तरीके मुझे बहुत सुन्दर लगते है.
इन सारी बातों का मज़ा ही यही है कि कहा ना जाए बल्कि और तरीके ढूँढे जाएँ कहने/समझने के.
मैने शायद कोई बात नहीं कही इस पूरे पोस्ट में या शायद कही है जिसे कहा नहीं जा रहा था मुझसे…क्योंकि मुझे लग रहा है अभी – वाह क्या शांति है!